Friday, May 15, 2020

गणगौर तीज की कथा और कहानी सिंजारा - चैत्र माह
चैत्र सुदी बीज के दिन गणगौर का सिंजारा होता है इस दिन जिस लड़की की सगाई की हुई हो तो ससुराल से साडी , गहना, शृंगार का सामान, मिठाई व फल आते है लड़की एक दिन पहले ही हाथो में मेहंदी रचाती है और तीज के दिन मन्दिर में गहने, कपड़े पहनकर भगवान के दर्सन करने जाती है |

सुहागन महिलाये भी मंदिर जाकर इच्छा अनुसार व्रत करती है और महिलाएं बायना निकालकर सासुजी को पैर लगकर बायणा देती है |

गणगौर तीज की कथा और कहानी - चैत्र माह

गणगौर के तीज की चारो कथा कहानी

पहली कहानी

गणगौरीया के दिन आये । तब पार्वताजी ने शिवजी से पूछा कि मैं थोड़े दिन के लिये पीहर जाऊं क्या ? भाभीसा और सहेलियां के साथ में गणगौर की पूजा करूंगी । तब शिवजी ने पीहर जाने के लिये इजाजत दे दी । पार्वतीजी खूब गहना व कपड़ा पहनकर खूब ठाट से गणगौर पूजन के लिये पीहर चली गई । 

पार्वताजी सोलह दिन तक भाभीयां व सहेलियों के साथ में खूबठाट - बाट संग गणगौर की पूजा की व गणगौर तीज के दिन शिवजी पार्वताजी को वापिस लेने के लिये आये । ससुराल में शिवजी की खूब खातीरदारी हुई । जब शिवजी को भोजन करवाने लगे तो शिवजी ने मजाक करने की सोची । उन्होंने सोचा कि सभी खाना मैं खा लूं तो पार्वताजी क्या खायेगी ? उन्होंने ऐसा ही किया । 

मां ने कहा - बेटी कुछ ही देर में खाना और बन जायेगा । तुम खाना खाकर ही जाना । किन्तु शिवजी जाने की जल्दी करने लगे । पार्वताजी ने कहा - पेट की बेटी तो कुछ भी खा सकती है । घर में जो भी हो देदो । 

छीके पर एक बथुए की पीन्डी रखी थी । पार्वतीजी ने पीन्डी खाकर , एक लोटा जल पीकर रवाने हो गयी । चलते - चलते शिवजी व पारवता जी एक बाग में ठहरे । शिवजी ने पूछा पार्वतीजी आपने क्या खाया ? 

पार्वता जी ने कहा - आपने खाया वहीं भोजन मैंने खाया । थोड़ी दूर आगे जाने पर शिवजीने फिर पूछा पार्वताजी आपने क्या खाया ? पार्वताजी ने जवाब दिया कि आपने खाया वही खाया । बेटी - जंवाई में कोई भेदभाव थोडे ही होवे । 

वह एक पेड़ के नीचे विश्राम करने लगे । पार्वताजी को नींद आ गयी । तब शिवजीने पावताजी के पेट की ढकनी खोलकर देखते हैं कि उसमें एक बछुए की पीडी और जल था । उन्होंने ढकनी वापिस ढक दी । 

पार्वताजी जब थोड़ी देर बाद ऊठी , जब शिवजी ने पार्वताजी से कहा कि आपने कहा कि मैंने खाया वहीं आपने खाया । पर आपके पेट में तो बथुए की पीन्डी और जल है । मैंने आपकी पेट की ढ़कनी खोलकर देखी है तो पार्वताजी ने कहा कि ससुराल की बात पीहर में और पीहर की बात ससुराल में ढ़कनी पड़ती है । पार्वताजी ने कहा अब आप ढ़कनी उल्टी ढक दे । जिससे कोई भी किसी के पेट की ढकनी खोलकर नहीं देख सके ।

दूसरी कहानी

गणगौर की तीज आई , पार्वताजी ने शिवजी को कहा - आज सब पूजन वाली आयेगी और उनको संवाग बांटना है । सब दूसरी जात की औरतें दौड़ - दौड़ने गई । पार्वताजी ने उनको घोबा - धोबा खूब संवाग बांटा और बाणीया , ब्राह्मण ऊँची जाति की औरतें स्नान करके वस्त्र - आभूषण धारण करके , सज - संवरकर पूजा करने पहुंची । 

शिवजी ने पार्वताजी से कहा कि आपकी खास सखी - सहेलियां तो अब आई है । आपने तो सब संवाग बांट दियो पर आपको तो संवाग देना पड़ेगा । तब पार्वताजी ने अंगुली में से मेंहदी निकाली , आंखों में से काजल , सिर से मेण निकाला , तिलक से रोली निकाली और हथेली में लेकर पानी से घोलकर सब औरतों पर छीटा दिया । जिसके पूरा छींटा मिला , उसको पूरा संवाग मिला , जिसके कम लगा उसको कम संवाग मिला ।

तीसरी कहानी

चैत्र का महिना आया । होली के दूसरे दिन से जंवारा बोकर लड़कियां गोर पूजने लगी । जब पार्वतीजी को भाभी के उजमणे के लिये पीहर जाना था तो महादेवजी ने पार्वतीजी से कहा मैं भी आपके साथ चलूंगा । तब ईसर - गौर नांदिया को साथ लेकर निकले । 

नंदी के ऊपर महादेवजी बैठे और पार्वतीजी पैदल चल रही थी तो लोग कहने लगे कि देखो - मोट्यार तो नंदी के ऊपर बैठा है और औरत पैदल चल रही है । इसके बाद पार्वतीजी नंदी पर बैठ गए और महादेवजी पैदल चल रहे थे तो लोग कहने लगे कि देखो , " औरत तो नंदीके ऊपर बैठी है और मोट्यार पैदल चल रहा है । 

जब ईसर - पार्वती दोनों पैदल चलने लगे । साथ - साथ नान्दियो भी चलने लगा । जब लोग कहने लगे कि देखो साध में वाहन होने के बावजूद भी पैदल चल रहे है । जब दोनों ही नदी के ऊपर बैठ गये । तो भी लोग कहने लगे कि - ' छोटो सो जीव है और दोनों ही नंदी के ऊपर बैठ गये । 

जब ईसरजी कहने लगे कि - देखो पार्वती दुनिया घोड़े पर बैठने देवं नहीं और न पैदल चलने देती है । शिवजी पार्वतीजी से बोला - ये मृत्यु लोक है । संसार है चड़े हुए को भी हँसे और पैदल में भी हँसे । थोड़ा आगे गया तो एक गाय कष्ट में थी । 

पार्वताजी ने पूछ - ये गाय क्यूं तड़फ रही है । शिवजी बोले - इसके बछड़ा होने वाला है । गोराद कहने लगी - बच्चे के लिये इतना कष्ट मैं सहन नहीं कर सकूगी , मेरे तो गांठ दे देयो । मेरे को बच्चा नहीं चाहिये । शिवजी , पार्वताजी दोनों और आगे गए तो एक घोड़ी उठ बैठ कर रही थी।

गोरादे कहने लगी कि घोड़ी कष्टी क्यों है ? जवाई सरजी कहने लगे कि इसके बच्चा होनेवाला है । गौरादे ने कहा मेरे गांठ दे देवो । मुझे तो इतना सहन नहीं होगा । ईसरजी आगे चले । आगे गए तो राजा की नगरी में उदासी छायी हुई थी । 

गोरादे प्रश्न पूछने लगी कि यहां सभी उदास क्यों है ? ईसरजी बोले - यहां रानी को कंवर होने वाला है । यह सुनकर गौरादे बोलती है कि बच्चे के लिये इतना कष्ट होता है तो मेरे को बच्चा नहीं चाहिये । मेरे गांठ देवो तो मैं चलू । गोरादे का हट आगे ईसरजी का चला नहीं तो गांठ देनी ही पड़ी । 

आगे ईसरजी ससुराल के गांव में पहुंचे । ईसरजी पीपल के पेड़ के नीचे वास किया । गोरादे पीहर में और सहेलिया में मग्न हो गयी । बड़ी गोर नजदीक आयी । जब गोरादे सहेल्या को लेकर चुइलो टिको लेने के लिये बाजार में गयी । 

वहां पर ईसरजी मोची का वेश लेने सुन्दर जूतियां लेकर बैठ गये । गोरादे का मन मोचड्या के पास चला गया । वह उस मोची को कहने लगी कि इस जूतीयां का दाम क्या है ? जब उस मोची ने कहा - देख बाई मैं तो बूढा हूँ । मेरे को तो एक घड़ा भरकर लाकर देदें । गोरादे घड़ा लेकर आ जाती है और कहती है कि जूतियां दे देवो । 

मोची बोलता है कि मेरे दो रोटी बनादो । गोरादे रोटीयां बना देती है और बोली - मुझे जूतियां का दामतो बताओ । मोची बोला - देख बाई मेरे कोई नहीं है , इतना समझले कि मेरे साथ दो कवा ले ले । यही जूतियां का मोल है । गोरादे इधर - उधर देखकर जल्दी से दो कवा ले लिया और जूतियां लेने घर पर आ गयी । 

जतियां महल में टांक दी सिंजारा के दिन ईशरजी पावणा आया । भोजन करके महल में सोने के लिये गये तो ईशरजी गोरादे से पूछने लगे । आज महल में रोशनी बहुत हैं । गोरा , बोलती है - " चांदणो पूतरो के , चांदों चाँदरो के चांदणों पियारो ! मेरे तो पुत्र भी नहीं है और पूर्णिमा भी नहीं जिसका चांद भी नहीं है । 

यहां दीपक की चांदनी है ईसरजी ने बोला ये तो रोशनी कोई दूसरी है , गोरादे क्या किया आप ही बताओ । ईसरजी ने कहा - " मोची के साथ दो कवा लिया उसकी रोशनी है । जब गोरादे जमीन कुचरने लग गये । ईसरजी ने बोला सच है या नहीं । गोरादे कहने लगी कि आपने कब देखा ? ईशरजी ने कहा - गोरादे यह तो मैं खुद था । दूसरा कोई और होता तो आप उनके साथ भोजन करते क्या । इस कारण औरतें मुझे ज्यादा ललचावनो नहीं । 

ईसरजी गोरादे घर आए । ईसरजी भोजन करने के लिये बैठे । जितना खाना बनाया वह सभी खा लिया । पांव से टक्कर मारकर झारी गिरादी , सासुजी कोशर्म आती है तो उतने में ही हांडी के ढ़कन खोलकर देखती है । बाद में गोरादे भोजन करने के लिये बैठती है । हांडी में कुछ नहीं होता है । 

जब मां गोरादे ने आठ बरसोला , दो सांगरी पिंड्या और लोटो भर पानी पीला कर सीख देती है । वहां से निकलने के बाद ईसर गोरादे पीपल के नीचे आए । ईसरजी ने बोला - यहां पर हम विश्राम कर लेते हैं गौरादे भूखी होने के कारण जल्दी से नींद आ गयी । नींद आई हुई को देखकर ईसरजी पार्वती के पेट की ड़कनी खोलने देखेतो आठ बर सोला दो सागरी पिंड्या और लोटा भर पानी में हिलडुल रही है और वापिस ढक्कन लगा देते है । 

गोरादे जागकर उठती है तब ईसरजी बोलते है - गोरादे आपने क्या खाना खाया ? गोरादे ने बोला - ईसरजी जो आपने खाया वहीं मैंने खाया । इसरजी कहते हैं कि सच बोलो । गोरादे कहती है कि एक हांडी में कोई भेदभाव होता है क्या ? ईशरजी ने गोरादे से कहा आपके पेट में आठ बरसोला , दो सांगरी पिंड्या लोटो भर पानी में हिलहुल रहा है । 

गोरादे ने कहा - जैसे मेरे पेट की डकनी खोलकर देखी वैसे सारे जग की खोलकर मत देखना । देखो पीहर की बात ससुराल में नहीं कहनी चाहिये और ससुराल की बात पीहर में नहीं कहनी चाहिये इतना कहकर आगे निकले । राजा के गांव में आए तो वहां बोल नगारा बज रहे थे और बधाईयाां बट रही थी । आनन्द ही आनन्द था । 

गोरादे पूछने लगी कि आज किस बात का आनन्द है? ईसरजीनेबोला - हम यहा से गये थे जब रानी कष्ट में थी । अब उनके घर लड़का हुआ है। इस लिये यहा पर आनन्द मना रहे है। जब गारादे बोलती है अब मेरी गाांठ खोलदो । ईसरजी ने बोला - मेरे दी हुई गाांठ खुलेगी नही। थोड़ा आगे गये कि घोड़ी के बच्चो होने से वहा भी खुशिया मनाई जा रही थी । जब पारवतीजी ने कहा - मेरी भी गाांठ खोल देवो । 

ईसरजी ने कहा - मैरी दी हुई गाांठ खुलेगी नही। आगे गया तो गाय का बछड़ा को चोट आई हुई थी । जब पार्वतीजी ने कहा - जानवर के बच्चे को भी इतना प्यार कर रहे हैं तो मानव के बच्चे की तो बात ही क्या ? 

देखो ईसरजी मेरी गाांठ खोल दो तो मैं आगे चलुगी नही तो मैं यहा पर ही रहूगी । जब ईसरजी डुम दुपया हुए तो पसीना आने लगा । शिवजी पारवतीजी तालाब के तीर पर गया । शिवजी माठी का एक पुतलो बनाकर अपने गण ( दतू ) से कहा कि जिसकी माां अपने बच्चे पीठ फेरके सो रही हो वे उन बच्चा का सिर काट ले आना । 

गण सब जगह घूमे, लेकिन कोई नही मिली । एक हथनी आपके बच्चा ने पीठ फेर कर सो रही थी । गण हाथी बच्चो को सिर काट के ले आया , शिवजी उस पुतला पर हाथी के बच्चों को सिर लगायो , पारवतीजी से बोला - ये लो बच्चा । 

पारवताजी ने बोला ! ऐसा सुण्ड वाला धुन्ध धुन्धालो बेटो तो मेरे को नही चाहिए । दुनिया देखेगी तो हसेगी । शिवजी ने कहा - आज से इसका नाम गजानन्द है। सब दुनिया सांसार में कोई सुभ काम होगा जब सबसे पहली आपके बेटा गजानन्द की पूजा करेंगे, बाद में दुसरो काम करेंगे।
जिससे पूरी दुनिया में आनन्द व खुशियाली होगी । पर्वताजी ख़ुशी से वापस कैलास पर्वत पर विराज गये। 

चौथी कहानी

राजा ने बोए जौ - चना , माली ने बोए दुब , राजा का जौ - चना बढ़ता जाए व माली की दुब घटती जाए । एक दिन माली के बेटे ने सोचा की राजा का जो - चना कैसे बढ़ रहे हैं, लेकिन मेरी दुब कैसे घट रही है? लम्बी - लम्बी दुब में जाकर छुप गये। लड़किया आकर किसी का हार खींचे कोई का डोरा खींचे । क्यों मेरा हार खींचो, क्यू मेरे डोरा खींचो । 

सोलह दिन का पूजापा देकर जायेंगे। सोलह दीन पूरा होते ही लड़किया आई । मा- मा पूजापा लाई, इसको कहा रखू। मा ने कहा - ओबरी में रख दो , लड़कियाां ओबरी में पुजापा रखकर वहा से चली गई । माली का बेटा आया कहा कि मााँ- मााँ लड़किया आयी थी । पुजापा ओबरी में रखा हुआ है । बेटे को कहा - जाकर पूजापा ले ले । 

बेटे ने ओबरी के एक लात मारी , दो लात मारी । मा- मा ओबरी तो नही खुले । ओबरी नही खुले तो परायी लाई हई को कैसे निभायेगा । परायी लायी हई को तो निभा लूंगा, लेकिन ओबरी नही खुले । नाखून में से मेंहदी निकाली । आख में से काजल , सिर में से रोली , चिटकी अगुली से छीटे दीये । फट से ओबरी खुल गई । देखें तो पूजापा की जगह हीरा , माणिक , मोती चमक रहे थे । तीज माता उनसे प्रसन्न हुई जैसी सबसे हो।

पापमोचनी एकादशी कहानी कथा और व्रत करने की विधि
यह व्रत चैत्र कृष्ण एकादशी को किया जाता है । इस दिन भगवान विष्णु को अर्घ्य देकर षोडशोपचार पूजा करनी चाहिये ।

पापमोचनी एकादशी कहानी कथा और व्रत करने की विधि


पापमोचनी एकादशी कहानी

कथा - प्राचीन समय में चित्ररथ नामक अति रमणीक वन था । उसी वन में देवराज इन्द्र गंधर्व कन्याओं व देवताओं सहित स्वछंद विहार करते थे । मेघावी नामक ऋषि भी यही तपस्या करते थे ।

ऋषि शैवोपासक तथा अप्सराएँ शिवद्रोहिणी अनंगदासी ( अनुचरी ) थी । एक समय का प्रसंग कि रतिनाह कामदेव ने मेधावी मुनि को तपस्या भंग करने के लिये मंजुकोषानामक अप्सराको नृत्य गानकरने के लिये उनके सम्मुख भेजा युवा अवस्था वाले ऋषि अपारा के हाव - भाव , नृत्य , गीत पर काम मोहित हो गए । 

रति क्रीड़ा करते हुए 57 वर्ष बीत गए । मंजुघोषा ने एक दिन स्वस्थान जाने की आज्ञा मांगी । आज्ञा मांगने पर मुनि के कानों चिंटी रेंगने लगी तथा उन्हें आत्मज्ञान हुआ । अपने को पापमार्ग में पहुंचाने का एक मात्र कारण अप्सरा मंजूषा को समझकर मुनि ने उसे क्रोधित होकर पिशाचनी होने का शाप दिया । 

शाप सुनकर मंजुघोषा वासु द्वारा प्रताड़ित कदली वृक्ष की भांति कांपते हुए मुक्ति का उपाय पूछा । तब मुनि पापमोचिनी एकादशी का व्रत करने को कहा । वह मुक्ति विधान बताकर मेघावी ऋषि पिता च्यवन के आश्रम में गये । 

शाप की बात सुनकर च्यवन ऋषि ने पुत्र की घोर निंदा की तथा उन्हें भी पापमोचिनी एकादशी का व्रत करने की आज्ञा दी । इस एकादशी के व्रत के प्रभाव से मंजुघोषा ने पिशाचनी योनि से तथा मेधावी ऋषि ने पाप से मुक्ति प्राप्त की ।

प्रेरित करने वाली कहनियाँ

  1. इंसान की समझ
  2. सूरज भगवान की कहानी

Monday, May 11, 2020

शीतला षष्ठी व्रत विधि कहानी और गीत
शीतला षष्ठी 
शीतला षष्ठी व्रत विधि कहानी और गीत

शीतला देवी को भोग लगाने वाले सभी पदार्थ एक दिन पूर्व ही बनाकर एक दिन का बासी भोग लगाया जाता है । इस में रसोईया की दीवार पर पांचों अंगुली घी में डूबोकर छापा लगाया जाता है । शीतला माता की कहानी भी सुनकर रात्री को दीपक जलाते हैं । 

यदि घर परिवार में शीतला माता के कुण्डारे भरने की प्रथा हो तो एक बड़ा कुण्डारा तथा दस छोटे कुण्डारे मंगवाकर छोटे कुण्डारे को बने हुए बासी व्यंजनों से भरकर बड़े कुण्डारे में रख दें । फिर उसकी हल्दी से पूजा कर दें । इसके बाद सभी कुण्डारों को शीतला माता के स्थान पर जाकर चढ़ा दें । जाते और आते समय शीतला माता का गीत भी गाया जाता है । 

पुत्र जन्म और विवाह के समय जितने कुण्डारे हमेशा भरे जाते हैं , उतने कुण्डारे बढ़ोत्तरी के रूप में और भरने चाहिये । यह व्रत चैत्र कृष्ण षष्ठी को किया जाता है । इसके करने से आय तथा संतान कामना फलवर्ती होती है । 

कहीं - कहीं इस दिन कुत्ते को भी टीका लगाकर तथा पकवान खिलाकर पूजा करते हैं । इस दिन व्रत रखने वाली स्त्री गर्म जल से स्नान नहीं करें और गर्म भोजन भी नहीं करना चाहिये । इसका महत्त्व बंगाल देश में है । शीतला माता की षोडशोपचार पूजा करके पापों की शर्मनार्थ प्रार्थना करें ।


शीतला षष्ठी कहानी

कहानी - किसी वैश्य के सात पुत्र थे । लेकिन विवाहित होते हुये भी सब नि : संतान थे । एक वृद्धा के उपदेश देने पर सातों पुत्र वधूओं ने शीतलाजी का व्रत किया तथा पुत्रवती हो गई । एक बार वणिक पली ने व्रत की उपेक्षा करते हुए गर्म जल से स्नान कर भोजन किया तथा दुर्मति बहओं से भी यह करवाया । 

उसी रात में वह वणिक पली भयावह स्वप्न में पति को मृतक देखती है । रोती - चिल्लाती पुत्रों तथा बहुओं को देखती है तो उनको भी चिर शैय्या पर यथावत् मरणासन्न पाती है । उसका रोना बिलखना सनकर पास पड़ोस के लोग माता शीतला के प्रति किया गया उसका प्रमाण ही बताते हैं ।

अपने ही हाथ की कुल्हाड़ी अपने देह में लगी देखकर वह पगली सी चीख कर वन में निकल पड़ी । मार्ग में उसे एक वृद्धा मिली , जो उसी की ज्वाला में तड़प रही थी । वह वृद्धा स्वयं शीतला माँ थी । उन्होंने बणिक भार्या से दही मांगा । 

उसने दही ले जाकर भगवती शीतला के सारे शरीर पर लेप कर दिया । जिससे उनके शरीर की ज्वाला शांत हो गयी । एक बार वणिक भार्या ने अपने पूर्वकृत गर्हित कर्मा पर बहुत पश्चाताप किया तथा अपने पति को जलाने की भगवती शीतला से प्रार्थना की । तब शीतला माता ने प्रसन होकर उसके पति - पुत्रों को पुनः जीवन दिया । वैसे हीसबकोपुन : जीवन प्रदान करें ।

शीतला माता का गीत 

मेरी माता को चिनिये चौबारो , 
दूध पूत देनीको चिनिये चौबारो । 
कौन ने मैया ईट थपाई , 
और कौन ने घोरो हे गारौ । 
श्री गजेन्द्र ने मैया ईटें थपाई , 
नरेश जी योरी है गारौ । 
मेरी माता को चिनिये चौबारो ॥ 

नोट - श्री गजेन्द्र व नरेश जी के स्थान पर अपने परिवार के सदस्यों का नामलेवें ।
शीतला माता की कहानी - चैत्र माह
शीतला माता की कहानी 
शीतला माता की कहानी - चैत्र माह

शीतला माता की कहानी

कहानी - शील और ओरी दोनों बहनें थी । होली का अंतिम दिन आते ही दोनों बहनें बोली - हम शहर चलकर देखें कि लोग हमारा कितना मान - सम्मान करते हैं । अपनी मान्यता को देखने के लिये दोनों बहनें शहर में आकर सबसे पहले वे दरबार में गई तो वहां पर नौकर - चाकर काम कर रहे थे । दोनों बहनों ने उनको जाकर बोला कि हमें भी कुछ न कुछ देवो । 

तब नौकर - चाकर ने कहा - हमारे पास तो केवल घोड़ा के लिये दाना उबल रहा है । उन्होंने गर्म - गर्म दाना दोनों बहनों को देने पर वह जल गई । जिससे उनके हाथ में फफोला ( छाले ) हो गये । 

इस कारण दोनों बहनों ने श्राप दे दिया कि सातवें दिन ही आपकी नगरी में आग लग जायेगी । ऐसा कहकर दोनों बहना वहां से चली गयी । इसके पश्चात् एक सेठ के घर आकर बोली - मुझे कुछ ठण्डी - ठण्डी खाने के लिये देवो । 

तभी उनकी छोटी बहू बोली मेरे सासुजी तो बाहर गये हुए हैं । फिर भी वह डरती - डरती मुश्किल से एक - एक कटोरी करबो लेकर आई तो दोनों बहनें बोलने लगी कि थोड़ा - सा और करबा लाओ व जितना भी है वह सभी डाल देवो और उस पर सीधा ढकन ढक दो । 

उस समय माताजी बोले कि तुम्हारे नगर में सातवें दिन आग लग जायेगी , किन्तु तुम्हारा घर बच जायेगा । तब छोटी बहू बोली ! मेरे घर की साथ - साथ मेरे पड़ौसी का भी घर रखो । क्योंकि मेरी साख कौन भरेगा ? 

तब माताजी ने एक कोरो करवा देकर कहा कि तेरे और पड़ोसी के घर के आगे कार ( रेखा ) खींच दी है । फिर दोनों बहना बोली कि मेरे माथे से जूऍ निकालो , पर तुम डरना मत । हम शील और ओरी दोनों बहनें हैं । हम दोनों के आगे - पीछे दोनों जगह आंखें हैं । 

छोटी बहू बोली मेरी नगरी में आग तो लगेगी । लेकिन कोई आकर पूगे तो मैं उन्हें क्या बताऊं ? आप जहाँ विराजते हैं वहां का स्थान मुझे बता दो । तब दोनों बहना बोली खोखले पीपल में बैठी है , ऐसा कहकर वह चली जाती है । 

जैसे ही साता दिन आग लगती है तो सारी नगरी जल जाती है । तब राजा बोलता है कि हमारी नगरी कैसे जल गयी । देखकर आओ कि कोई घर बचा है क्या ? तब एक ने कहा कि हां एक घर बचा है । तब राजा उसके पास गया और कहा कि ए बाई तुम क्या कामण - डुमण जानती हो , जिससे तुम्हारा घर बच गया । 

तब छोटी बहू बोली ! शील और ओरी दो बहनें आई थी । तब उनको घोड़ी का गर्म - गर्म दाना डालने से वह जल गयी । उनके हाथ में छाला ( फोड़े - फुसी ) हो गये । जिससे वे गुस्सा में आकर श्राप दे दिया कि तुम्हारी नगरी में आग लग जायेगी । 

फिर मेरे घर आयी , तब मैंने में ठण्डा - ठण्डा जल देकर ठण्डाकिया और पड़ौसी का भी घर रखा । अब वे दोनों बहना खोखले पीपल में बैठी है । राजा वहां गया और उनसे माफी मांगी और पांव पकड़ कर कहा - माताजी हमसे गलती होगयी , आप हले क्षमा कर दो । 

तब माताजी ने कहा कि आप माताजी के नाम का स्थान बनाकर मेरी वहां पर स्थापना करो और नगरी में कहलाओ कि होली के बाद माताजी का दिन आवे तब ठण्डा खाओ । हो सके तो आठ बार खाओ , चारबारखाओ , दोबारखाओ , लेकिन बच्चों की मां कोतो एक बार जरुर - जरूर ठण्डा भोजन करना है । माताजी सभी पर प्रसन हो गये । 

जो भी व्यक्ति माताजी की इस कहानी को कहते समय , सुनते समय बीच - बीच में हुंकारा देते हैं उन सभी को माता जी ठण्डा झोला देते हैं ।

बोलो शीतला माता की जय | 

Tuesday, May 5, 2020

सांपदा का डोरा विधि पूजा व्रत और माता की कहानी
सांपदा का डोरा विधि पूजा व्रत और माता की कहानी 




सांपदा के डोरे की विधि व पूजा

होली के दूसरे दिन छारंडी को कच्चा सूत का सोलह तार का धागा , सोलह गांठ कुंकु या हल्दी में रंग कर हाथ में लेकर कहानी सुने और सोलह दाने ही गेहू के भी लेवे । कहानी सुनने के बाद डोरे को गले में बांधे या पूजा के आले मे रखे सवा महिने के बाद वापिस कहानी सुन कर यह डोरा पीपल में या तालाब में विसर्जित कर देते हैं । उस दिन व्रत ( ही समय भोजन ) करते हुए एक ही धान की रसोई खाते हैं ।


सांपदा माता की कहानी और कथा 

एक राजा था । राजा का नाम नल और रानी का नाम दमयन्ती था। उनके बहुत धन था । एक दिन महल के नीचे बुदिया सांपदा का डोरा बाट रही थी और सांपदा माता की कहानी कह रही थी । इसलिये महलके नीचे बहुत भीड़ हो गई थी । हर कोई सांपदा का डोरा ले रहे थे । रानी ने ऊपर देखा तो अपनी दासी को कहां कि नीचे देखकर आ इतनी भीड़ क्यों हो रही है ? दासी ने आकर कहा कि एक बुढ़िया सांपदा का डारादेरही । ।

उससे सुख - समृद्धि , धन - लक्ष्मी होती हैं । वो डोरा कच्चे सूत का सोला तार , सोलह गांठ देकर हल्दी में रंग के पूजा करते हैं । सोलह दाना गेहूं का हाथ में लेकर कहानी - कथा सुनकर वह डोरा गले में बांध देते हैं । रानी भी डोरा मंगाकर बताए हुए विधि - विधान से पूजा करके वह डोरा अपने गले में पहने हुए हार के साथ बांध दिया । बाहर से राजा आये तब उसकी गले में डोराबांधा हुआ देखा तो पूछा यह डोरा क्यों बांध रखा है 


तो रानी ने कहा - यह सांपदा माता का डोरा हैं । इससे घर में सुख - समृद्धिव धन - लक्ष्मी आती हैं तो राजा ने कहां अपने तो पहले से ही बहुत धन - दौलत है । तेरे इतने हीरे - मोती के गहनों में यह डोरा अच्छा नहीं लगता है । राजा के इतना कहने पर भी रानी ने डोरा नहीं खोला तो राजा ने डोरा खिंचकर तोड़कर फेंक दिया । 


उसी दिन राजा को सपने में सांपदा माता बोली कि मैं यहां से जार ही हूँ । अब तेरे सांपदा की आशीष से सारा धन का कोयला हो जायेगा । जितना भी सुख का गुमान किया , उतना ही तुम को कष्ट भोगना पड़ेगा । राजा उठकर देखें तो सपने की बात सच्ची जान कर रानी को बोला । 


तुम तेरी सखिया के पास जाकर आ रानी सखिया के पास गई जब बात तो सबको करी लेकिन कोई खातिरदारी नहीं करी । रानी आकर राजा जी ने बात बतायी । जब राजाजी ने बोला - हम दूसरे राज्य में चलकर जीवन काटेंगे । यहां पर एक ब्राह्मण की लड़की को छोड़ देंगे । जिसको दिया वही पानी भरेगा और घर की देखभाल करेगा । राजा - रानी महल से चलने लगे तो महल का कंगुरा टेदा हो गया । घर से निकलकर वे लोग तालाब पर पहुंचे । वहां राजा में रानी को दो तीतर लाकर दिये और बोले की मै स्नान करके आउ तब तक तुम इन्हें भूनकर रखना । 


रानी ने तीतर को भूनकर रखा । राजा स्नान करके आये । दोनों भोजन करने के लिये बैठे तो दोनों भूने हुए तीतर उड़ गए । वहां से राजा - रानी रवाने होकर अपने दोस्त खाती के यहां गये तो खाती ने पूछा कौनसे वेश में आए है तो आदमी ने बताया गरीब वेश में आया हूँ । तब खाती ने कहा कि मेरे पुराने घर में उतार दो । राजा - रानी खाती के पुराने मकान में गये । 


यहां खाती के सोने के बरछी बसोला ( औजार ) पड़े थे । उनको जमीन निगल गई । तब राजा - रानी से बोला कि हम यहां से निकल चलते हैं । नहीं तो अपने ऊपर चोरी का नाम आ जायेगा । वहां से वह अपने दोस्त राजा के यहां गया । तब राजा ने पूछा - कौनसे वेश में आया है ? सबने कहा मैले कपड़े में आया है तो राजा ने भी पुराने महल में उतार दिया । वहां खूटी पर सवा करोड़ का हार टंगा हुआ था । 


राजा - रानी के ऊपर महल में जाते ही दीवार पर मोर मण्डा हुआ था । वो खूटी पर टंगा हुआ हार मोर ने निगल लिया । तब राजा ने रानी से कहा कि यहां से भी चलना पड़ेगा , नहीं तो चोरी का आरोप लग जायेगा । तब सब कोई बोलने लगे कि राजा का दोस्त आया था जो हार चोरी करके ले गया । राजा ने कहां मेरा दोस्त चोर तो नहीं था , लेकिन गरीबी के कारण ले गया होगा । 


वहां से राजा - रानी अपनी बहन के यहां गये । सबने कहां कि तेरा भाई आया है । बहन ने पूछा कौनसे हालत में आया है सबने कहां गरीबी के हालात में आया है । बहन ने कहां सरोवर की पाल पर उतार दो । बहन एक धन से भरा घड़ा भाई के पास लेकर आयी । भाई जब घड़ा देखने लगा तो सारा धन काला हो गया । तब भाई ने कहा यह घड़ा यही पर गाड दो 


राजा - रानी वहां से माली के बगीचे में गये । बगीचे में पैर रखते ही बगीचा हरा - भरा हो गया । तब माली ने पूछ ऐसी कौनसी पुण्यात्मा आयी है , जिससे बारह वर्ष से सूखा हुआ बगीचा हरा - भरा हो गया । राजा ने कहा - हम तो भिखारी है । तुम हम को रख लो । माली ने उनको काम पर रख लिया । रानी ने कहा - चार काम नहीं करुँगी। 


एक दिया नहीं जलाऊँगी , बिस्तर नहीं बिछाऊँगी, बर्तन साफ़ नहीं करुँगी करूंगी , झाडू नहीं निकालुंगी । तब मालीन बोली - मैं तेरे से कुछ नहीं कराऊंगी । तुम केवल फूल की माला गूंथ कर बाजार में बेचकर आना और राजा के लिये कुएं में से पानी निकाल देना । 


जब रानी बाजार में फल की माला बेचने गयी तो औरतों ने कहा थोड़ी देर बैठ , हम कहानी सुनकर लेंगे । रानी ने पूछा - यह आप क्या कर रही हैं और किसकी कहानी सुन रही हो ? तब औरतों ने कहा कि हम सांपदा माता की कहानी सुन रहे हैं । 


रानी ने कहा - मैं भी सांपदा माता की कहानी सुनती थी । लेकिन मेरे पति ने सांपदा माता का डोरा फेंक दिया । उस दिन से सांपदा माता मेरे से नाराज हैं । बारह वर्ष हो गये , अगर सांपदा माता हमारे ऊपर प्रसन्न हो जाये तो में सांपदा माता का डोरा ले लूं । उसी दिन सांपदा माता राजा के सपने में आयी तो राजा ने पूछा - आप कौन है ? 


सांपदा माता बोली - मैं तेरे पास वापिस आऊंगी । राजा ने पूछा कैसे मालूम चलेगा । जब सांपदा माता बोली कि सुबह कुआं से पानी निकालेगा तब पहली बार में गेहूँ की बाली निकलेगी , दूसरी बार में हल्दी की गांठ , तीसरी बार में कच्चा सूत निकलेगा । तब समझ जाना कि सांपदा माता आ गयी हैं और रानी को डोरा दिलाकर घर चले जाना । 


दूसरे दिन राजा कुएं से पानी निकालने लगा तब सांपदा माता ने कहा वैसा ही हुआ । फिर रानी को डोरा दिलाकर वापिस अपने महल के लिये रवाना हुए तो माली को बोले कि हमारे बारह वर्ष पूरे हो गये हैं । हमारे दिन अच्छे आ गये और वहां से अपनी बहन के यहां गये , तो बहन ने पूछा - कौनसे वेश में आये हैं , सबने कहां अच्छी हालात में आए हैं । बहन ने कहा मेरे नये महल में उतार दो । 


भाई ने कहा - हमको जहां पहले उतारे थे वहीं पर उतारो । वहां जाकर पहले गढ़ा हुआ घड़ा निकाला तो घड़े में हीरे - मोती जगमगा रहे थे । राजा ने बहुत सारा धन बहन को दिया और वहां से अपने दोस्त राजा के यहां गये तो वहां भी जो हार टंगा हुआ मोर ने निगल लिया था वो भी हार खूटी पर ही टंगा हुआ था । 


वहां से अपने गांव के खाती के पास गये । खाती को औजार भी जो धरती निगल गयी थी वह भी वापिस खाती के पास आ गये । वहां से राजा - रानी सरोवर की पाल आये , देखा तो दोनों तीतर भुने हए धरती पर पड़े हैं । राजा - रानीमन समझ गये कि समय खराब था । 


ये भी उड़ गये थे । आज वापिस आ गये है । वहां से राजा - रानी अपने महल में आये , जो कंगुरा टेदा हो गया था वह भी वापिस सीधा हो गया और पहले जैसा ही वापिस अच्छा हो गया । जो ब्राह्मण की बेटी को देखभाल के लिये छोड़ गये थे । उसको धर्म की बेटी बनाकर उसका विवाह कर दिया । 

पीछे रानी ने सांपदा माता का उजमणा किया । उसमें सोलह ब्राह्मणी को भोजन करवाया 

आप चाहे तो सोलह जगह परिवार में मिठाई दे देवें । सांपदा माता के उजमणा में हलवा - पुडी की रसोई होती हैं । रानी ने कहा - हे सांपदा माता तुमने मेरी लाज रखी , वैसी ही सबकी लाज रखना । जैसा मेरे को दुःख - कष्ट दिया वैसा किसी को भी मत देना । 

सांपदा माता की जय ।

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Wednesday, April 29, 2020

गणगौर की कहानी उजमना विधि हिंदी में
गणगौर की कहानी 

चैत्र के महीने में होली के दूसरे दिन ( छारंडी के दिन ) कुंवारी कन्यायें व विवाहित महिलाएं सोलह दिन तक गणगौर की पूजा करती है  

गणगौर की कहानी उजमना विधि हिंदी में

उजमणा की विधि

: कुंवारी कन्यायें एक विवाहित महिला को एवं एक साख्या को आलू की सब्जी , पुड़ी  केर - सांगरी का भोजन करवाना  

गणगौर की कहानी - कथा 

सात सहेलिया थी : तो अमीर थी एक गरीब थी : लड़कियां गणगौर का व्रत करने की सोची और सातवी लड़की को भी कहा कि तुम भी व्रत करो , हम सभी कर रहे हैं सातवीं सहेली ने मना कर दिया तो भी वे उनकी बात को मानी नहीं और वे अपनी सहेली के घर जाकर उसकी मां को कहा - ये भी हमारे साथ - साथ व्रत कर लेगी  

लेकिन सातवीं सहेली की मा ने कहा - मेरे घर में तो ऐसा कुछ नहीं है सुबह करे तो शाम को नहीं , शाम को लावे तो सुबह नहीं लेकिन वे सहेलियां तो मानी भी नहीं और कहा एक - एक दिन करके वह हम सबके यहां व्रत कर लेगी ऐसे करके इसके पूरे व्रत होजायेंगे , लेकिन आप इसको मना मत करो  

सभी सहेलियां की जिदद करने पर माँ को बेटी के व्रत करने की बात माननी पड़ी किसी भी तरह से छः दिन व्रत करने में निकल गये सातवें दिन सभी सहलियां एकता करके सातवीं सहेली के घर आई और सहेली उसकी माँ को कहा - छः दिन तक तुमने सभी सहेलियों के यहां भोजन किया तो कल मैं सब आपके घर व्रत करने के लिये आयेंगे । लेकिन मां - बेटी तो घबरा गई कि अब क्या होगा ? माँ तो बेटी को खूब खरी - खोटी सुनाने लगी । 

मैंने तो तुझे पहले हीमना किया था , परन्तु तुमने मेरी बात मानी नहीं और उसको जोर - जोर से मारने लगी । ऐसे में गरीब सहेली जंगल में चली गयी और चिन्ता करते - करते उसको नींद आ गयी । उधर शिवजी और पार्वतीजी की सवारी निकल रही थी , तब पार्वतीजी का ध्यान जाने पर शिवजी को कहा कि ये कौन सो रही है और इसे क्या चाहिये । 

शिवजी भगवान ने बोला - यहां पर तो बहुत से लोग आते - जाते हैं । और सोए रहते हैं मैं किस - किस का ध्यान रखू । लेकिन पार्वताजी ने हठ पकड़ ली और कहने लगी कि आपको तो इसका ध्यान रखना ही पड़ेगा । ये तो हमारी शरण में आई हुई हैं । इसको नहीं पूछोगे तो हमारे को धरती पर कौन पूजा करेगा । शिवजी व पार्वता जी नीचे उतर कर उसको पूछा कि उठ तेरे को क्या चाहिये । वह उठकर देखे तो शिवजी व पार्वताजी सामने खड़े है । 

उसने कहा - मैं बहुत ही विपदा में हूँ । मैंने गणगौर के व्रत किये हैं । मेरे घर कल छः सहेलियां भोजन करने के लिये आयेगी । मेरे घर में तो कुछ भी खाने के लिये नहीं है । मैं उनको क्या भोजन कराऊंगी । इस कारण मैं यहां आकर बैठी हूँ । 

तब ईसरजी को दया आने पर कहा कि तेरे से जितने कंकर - पत्थर उठा सकती है उतने इक्ट्ठा करके घर पर ले जाकर घर की ओबरी में डाल देना और थोड़ा पालना में डाल देना । उसने जंगल से कंकर - पत्थर लाकर पालना और ओबरी में डाल दिया । माँ बाहर से आकर पूछती है कि इतना क्या लेकर आई है । इतना कहकर माँ ओबरी खेलती है तो हीरा - मोती झगमग करता हुआ देखें और बाहर आकर पालना में छोटा - सा कंवर खेलता हुआ देखें । 

फिर माँ बेटी को आवाज देकर कहती हैं कि देख - देख ये क्या हो गया है ? इतने हीरे - मोती कहां से लाई है ? जब बेटी माँ को बताती है कि ईसर - पार्वताजी जंगल में मिले और मैं कंकर - पत्थर उठाकर घर पर ले आई । यह सभी बातें बेटी माँ को बताती है । फिर माँ एक हीरा लेकर बाजार में बेचकर सभी किराणा का सामान खरीद कर लेकर आती है और खुब खाने के अच्छे - अच्छे पकवान बनाती है । 

पार्वतीजी के आशीर्वाद से उनकी रसोई में छत्तीस सालना बत्तीस तरह के भोजन हो गये । इधर सभी सहेलियां उनके घर भोजन करने के लिये आई । सातवीं सहेली के ठाट - बाट देखकर वह दंग रह गई और खूब मौज - मस्ती से भोजन किया । घर जाने में देरी होजायेगी । उनकी माँ ने सोचा कि मेरी बंटियां भूखी - प्यासी बैठी हुई होगी । इसलिये वह थाली में सब्जी व पुडी लेकर आती है । 

यहां आकर देखें तो सभी सहेलियां उछल - कूद कर रही थी । सभी की माँ ने पूछा कि कल तक तो तेरे घर में खाने के लिये कुछ नहीं था तो फिर इतना सब कुछ कहां से लाई हो । फिर गरीब सहेली जंगल से लेकर अपनी पूरी कहानी सुनाती हैं । जब एक सहेली की मां सोचती है कि इतना करने से ऐसा ठाट - बाट हो जाये तो मैं भी ऐसा ही करके देखू । 

वह भी अपनी बेटी से कहने लगी कि तुम भी ऐसा ही करो । लेकिन बेटी माँ को बहुत समझाने के बावजूद भी वह नहीं मानती है । तब बेटी भी जंगल में जाती है तो उसको भी शिवजी व पार्वतीजी मिलते है । गरीब सहेली को कहा जैसा ही उसको कहते हैं कि कंकर - पत्थर ओवरी में जाकर डाल देना । लेकिन उसके यहां हीरे - मोती की जगह सांप - बिच्छू हो जाते हैं । 

वह भी सहेली अपनी सारी सहेलियों को भोजन करने के लिये अपने घर बुलाने के लिये जाती हैं तो सहेलियां कहती हैं कि तुमने तो खाना खिला दिया अब बार - बार क्या हैं ? लेकिन सहेली माँ के डर से वह सभी सहेलियों को कह कर तो आ गयी । सभी सहेलियां भोजन करने के लिये सहेली के घर में सांप - बिच्छूको देखकर हाहाकार करने लगी । 

सहेली की मां घबरा गई । अब उसके मन पछतावे में यूंही देखा - देखी करने से उसके घर में तो बहुत ही धन हो गया और खुद के घर में सांप - बिच्छु हो गया । सभी सहेलियां आपस में कहने लगी कि इसने तो धन के लालच में आकर ऐसा किया । फिर माँ - बेटी गरीब सहेली के घर गयी और पांव पकड़कर कहा कि माजी मुझे माफ कर दो और इस सांप - बिच्छूओं को यहां से निकाल दो । 

जब सातवीं सहेली की मां ने कहा - शिवजी व पार्वताजी की पूजा - अर्चना करो और उनसे माफी मांगों । तब दोनों माँ - बेटी शिवजी व पार्वतीजी की पूजा - अर्चना करके असे माफी मांगी और कहा - ईसरजी व गणगौर जी मेरे ऊपर टूटे , वैसा किसी के भी ऊपर मत टूटना । माँ - बेटी पर शिवजी व पार्वती जी प्रसन हुए और रिद्धि - सिद्धि कर ध्यान सबका किया । खोटी की खरी अधूरी की पूरी जानना ।

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