गणगौर की कहानी उजमना विधि हिंदी में

गणगौर की कहानी 

चैत्र के महीने में होली के दूसरे दिन ( छारंडी के दिन ) कुंवारी कन्यायें व विवाहित महिलाएं सोलह दिन तक गणगौर की पूजा करती है  

गणगौर की कहानी उजमना विधि हिंदी में

उजमणा की विधि

: कुंवारी कन्यायें एक विवाहित महिला को एवं एक साख्या को आलू की सब्जी , पुड़ी  केर - सांगरी का भोजन करवाना  

गणगौर की कहानी - कथा 

सात सहेलिया थी : तो अमीर थी एक गरीब थी : लड़कियां गणगौर का व्रत करने की सोची और सातवी लड़की को भी कहा कि तुम भी व्रत करो , हम सभी कर रहे हैं सातवीं सहेली ने मना कर दिया तो भी वे उनकी बात को मानी नहीं और वे अपनी सहेली के घर जाकर उसकी मां को कहा - ये भी हमारे साथ - साथ व्रत कर लेगी  

लेकिन सातवीं सहेली की मा ने कहा - मेरे घर में तो ऐसा कुछ नहीं है सुबह करे तो शाम को नहीं , शाम को लावे तो सुबह नहीं लेकिन वे सहेलियां तो मानी भी नहीं और कहा एक - एक दिन करके वह हम सबके यहां व्रत कर लेगी ऐसे करके इसके पूरे व्रत होजायेंगे , लेकिन आप इसको मना मत करो  

सभी सहेलियां की जिदद करने पर माँ को बेटी के व्रत करने की बात माननी पड़ी किसी भी तरह से छः दिन व्रत करने में निकल गये सातवें दिन सभी सहलियां एकता करके सातवीं सहेली के घर आई और सहेली उसकी माँ को कहा - छः दिन तक तुमने सभी सहेलियों के यहां भोजन किया तो कल मैं सब आपके घर व्रत करने के लिये आयेंगे । लेकिन मां - बेटी तो घबरा गई कि अब क्या होगा ? माँ तो बेटी को खूब खरी - खोटी सुनाने लगी । 

मैंने तो तुझे पहले हीमना किया था , परन्तु तुमने मेरी बात मानी नहीं और उसको जोर - जोर से मारने लगी । ऐसे में गरीब सहेली जंगल में चली गयी और चिन्ता करते - करते उसको नींद आ गयी । उधर शिवजी और पार्वतीजी की सवारी निकल रही थी , तब पार्वतीजी का ध्यान जाने पर शिवजी को कहा कि ये कौन सो रही है और इसे क्या चाहिये । 

शिवजी भगवान ने बोला - यहां पर तो बहुत से लोग आते - जाते हैं । और सोए रहते हैं मैं किस - किस का ध्यान रखू । लेकिन पार्वताजी ने हठ पकड़ ली और कहने लगी कि आपको तो इसका ध्यान रखना ही पड़ेगा । ये तो हमारी शरण में आई हुई हैं । इसको नहीं पूछोगे तो हमारे को धरती पर कौन पूजा करेगा । शिवजी व पार्वता जी नीचे उतर कर उसको पूछा कि उठ तेरे को क्या चाहिये । वह उठकर देखे तो शिवजी व पार्वताजी सामने खड़े है । 

उसने कहा - मैं बहुत ही विपदा में हूँ । मैंने गणगौर के व्रत किये हैं । मेरे घर कल छः सहेलियां भोजन करने के लिये आयेगी । मेरे घर में तो कुछ भी खाने के लिये नहीं है । मैं उनको क्या भोजन कराऊंगी । इस कारण मैं यहां आकर बैठी हूँ । 

तब ईसरजी को दया आने पर कहा कि तेरे से जितने कंकर - पत्थर उठा सकती है उतने इक्ट्ठा करके घर पर ले जाकर घर की ओबरी में डाल देना और थोड़ा पालना में डाल देना । उसने जंगल से कंकर - पत्थर लाकर पालना और ओबरी में डाल दिया । माँ बाहर से आकर पूछती है कि इतना क्या लेकर आई है । इतना कहकर माँ ओबरी खेलती है तो हीरा - मोती झगमग करता हुआ देखें और बाहर आकर पालना में छोटा - सा कंवर खेलता हुआ देखें । 

फिर माँ बेटी को आवाज देकर कहती हैं कि देख - देख ये क्या हो गया है ? इतने हीरे - मोती कहां से लाई है ? जब बेटी माँ को बताती है कि ईसर - पार्वताजी जंगल में मिले और मैं कंकर - पत्थर उठाकर घर पर ले आई । यह सभी बातें बेटी माँ को बताती है । फिर माँ एक हीरा लेकर बाजार में बेचकर सभी किराणा का सामान खरीद कर लेकर आती है और खुब खाने के अच्छे - अच्छे पकवान बनाती है । 

पार्वतीजी के आशीर्वाद से उनकी रसोई में छत्तीस सालना बत्तीस तरह के भोजन हो गये । इधर सभी सहेलियां उनके घर भोजन करने के लिये आई । सातवीं सहेली के ठाट - बाट देखकर वह दंग रह गई और खूब मौज - मस्ती से भोजन किया । घर जाने में देरी होजायेगी । उनकी माँ ने सोचा कि मेरी बंटियां भूखी - प्यासी बैठी हुई होगी । इसलिये वह थाली में सब्जी व पुडी लेकर आती है । 

यहां आकर देखें तो सभी सहेलियां उछल - कूद कर रही थी । सभी की माँ ने पूछा कि कल तक तो तेरे घर में खाने के लिये कुछ नहीं था तो फिर इतना सब कुछ कहां से लाई हो । फिर गरीब सहेली जंगल से लेकर अपनी पूरी कहानी सुनाती हैं । जब एक सहेली की मां सोचती है कि इतना करने से ऐसा ठाट - बाट हो जाये तो मैं भी ऐसा ही करके देखू । 

वह भी अपनी बेटी से कहने लगी कि तुम भी ऐसा ही करो । लेकिन बेटी माँ को बहुत समझाने के बावजूद भी वह नहीं मानती है । तब बेटी भी जंगल में जाती है तो उसको भी शिवजी व पार्वतीजी मिलते है । गरीब सहेली को कहा जैसा ही उसको कहते हैं कि कंकर - पत्थर ओवरी में जाकर डाल देना । लेकिन उसके यहां हीरे - मोती की जगह सांप - बिच्छू हो जाते हैं । 

वह भी सहेली अपनी सारी सहेलियों को भोजन करने के लिये अपने घर बुलाने के लिये जाती हैं तो सहेलियां कहती हैं कि तुमने तो खाना खिला दिया अब बार - बार क्या हैं ? लेकिन सहेली माँ के डर से वह सभी सहेलियों को कह कर तो आ गयी । सभी सहेलियां भोजन करने के लिये सहेली के घर में सांप - बिच्छूको देखकर हाहाकार करने लगी । 

सहेली की मां घबरा गई । अब उसके मन पछतावे में यूंही देखा - देखी करने से उसके घर में तो बहुत ही धन हो गया और खुद के घर में सांप - बिच्छु हो गया । सभी सहेलियां आपस में कहने लगी कि इसने तो धन के लालच में आकर ऐसा किया । फिर माँ - बेटी गरीब सहेली के घर गयी और पांव पकड़कर कहा कि माजी मुझे माफ कर दो और इस सांप - बिच्छूओं को यहां से निकाल दो । 

जब सातवीं सहेली की मां ने कहा - शिवजी व पार्वताजी की पूजा - अर्चना करो और उनसे माफी मांगों । तब दोनों माँ - बेटी शिवजी व पार्वतीजी की पूजा - अर्चना करके असे माफी मांगी और कहा - ईसरजी व गणगौर जी मेरे ऊपर टूटे , वैसा किसी के भी ऊपर मत टूटना । माँ - बेटी पर शिवजी व पार्वती जी प्रसन हुए और रिद्धि - सिद्धि कर ध्यान सबका किया । खोटी की खरी अधूरी की पूरी जानना ।

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