व्रत और उपवास करने के सामान्य नियम और फायदे

व्रत और उपवास करने के सामान्य नियम 

व्रत और उपवास करने के सामान्य नियम और फायदे

पहला नियम 

व्रत के दिनों में सूर्योदय से दो मुहर्त पहले शय्या से उठ कर शौचादि से निवृत्त होकर बिना कुछ खाए - पीये , सूर्य एवं जिस देवता का व्रत हो , उस देवता को प्रणाम कर , अपनी अभिलाषा ( मनोकामना ) निवेदन करके व्रतारम्भ करें ।

दूसरा नियम 

सभी व्रतों में क्षमा , सत्य , दान , दया , शौच , इन्द्रिय निग्रह , अहिंसा संतोष एवं झूठ नहीं बोलना , देव - पूजा तथा हवन इत्यादि व्रतों के सामान्य नियम कहे गये है ।

तीसरा नियम 

नित्य व्रत और नेमिक्तिक व्रत में यदि सूतक हो जाए तो प्रतिनिधि द्वारा व्रत करवाना चाहिये । स्त्रियों को यदि ज्वर ( बुखार ) आ जाए अथवा व्रत करने में असमर्थ हो , डिलेवरी जैसी अवस्था में व्रती अपने पुत्र , बहन , भाई , मित्र अथवा ब्राह्मण द्वारा उस व्रत को पूर्ण करवा सकती है ।

पति - पली एक दसरे के प्रतिनिधि के रूप में व्रत कर सकते है ।

यदि कोई महिला व्रत के दिन " रजस्वला " हो जाए तो व्रत , उपवास स्वयं करें और कथा पूजन - दान आदि का कार्य प्रतिनिधि के द्वारा पर्ण करवाएँ ।

किसी भी व्रत - त्यौहार के उद्यापन में पूजन के लिये बंधन नहीं है कि हम सोने - चांदी की मूर्ति बनावे । इसमें अपनी आर्थिक स्थिति ही प्रधान है । मूर्ति के अभाव में चित्र का भी प्रयोग किया जा सकता है । मूर्ति का प्रमाण अंगुष्ठ मात्र से एक बलिस्थ का हो सकता है ।

निर्देष  

अधिकतर  व्रत कहानी में शाम को चन्द्रमा जी को अरग देकर पूजा करके ही व्रत खोलते है ।

चन्द्रमा को अरग देने वाले दोहे 

1 . सोना केरी मोरनी , मोतिया केरा हार ।
     मैं संवागण चांद देखु , जीयो मारो वीरभरतार । ।
2 . जागता जगन्नाथ , पौढ़ता पगन्नाथ ।
     चन्द्रमा जी ने अरग देवता , जियो मारा वीर भरतार । ।
3 . चाँदा हेलो उगियो , हरिया बांस कटाय ,
     साजन ऊबा बारने , आखा पाती लाय ।
4 . काहे केरो दीवलो , काहे करी बाट ,
     सेना केरा दीवलो , रूपा केरी बाट ।
5 . कौन संजोयो दीवलो , कौन संजोईं बाट ,
     पीलो ओढ़ मैं दिवलो संजोयो , रेशम केरी बाट ।
6 . पीलो ओदके मुलकियो , अरग देऊ करतार ,
     माघी चौथ को चांद देखतां , जियो वीर भरतार ।

विशेष निर्देश  

सभी व्रत कहानियों की कहानी कहने के बाद श्री गणेश जी की  कहानी जरूर - जरूर कहे


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