गणगौर तीज की कथा और कहानी सिंजारा - चैत्र माह

चैत्र सुदी बीज के दिन गणगौर का सिंजारा होता है इस दिन जिस लड़की की सगाई की हुई हो तो ससुराल से साडी , गहना, शृंगार का सामान, मिठाई व फल आते है लड़की एक दिन पहले ही हाथो में मेहंदी रचाती है और तीज के दिन मन्दिर में गहने, कपड़े पहनकर भगवान के दर्सन करने जाती है |

सुहागन महिलाये भी मंदिर जाकर इच्छा अनुसार व्रत करती है और महिलाएं बायना निकालकर सासुजी को पैर लगकर बायणा देती है |

गणगौर तीज की कथा और कहानी - चैत्र माह

गणगौर के तीज की चारो कथा कहानी

पहली कहानी

गणगौरीया के दिन आये । तब पार्वताजी ने शिवजी से पूछा कि मैं थोड़े दिन के लिये पीहर जाऊं क्या ? भाभीसा और सहेलियां के साथ में गणगौर की पूजा करूंगी । तब शिवजी ने पीहर जाने के लिये इजाजत दे दी । पार्वतीजी खूब गहना व कपड़ा पहनकर खूब ठाट से गणगौर पूजन के लिये पीहर चली गई । 

पार्वताजी सोलह दिन तक भाभीयां व सहेलियों के साथ में खूबठाट - बाट संग गणगौर की पूजा की व गणगौर तीज के दिन शिवजी पार्वताजी को वापिस लेने के लिये आये । ससुराल में शिवजी की खूब खातीरदारी हुई । जब शिवजी को भोजन करवाने लगे तो शिवजी ने मजाक करने की सोची । उन्होंने सोचा कि सभी खाना मैं खा लूं तो पार्वताजी क्या खायेगी ? उन्होंने ऐसा ही किया । 

मां ने कहा - बेटी कुछ ही देर में खाना और बन जायेगा । तुम खाना खाकर ही जाना । किन्तु शिवजी जाने की जल्दी करने लगे । पार्वताजी ने कहा - पेट की बेटी तो कुछ भी खा सकती है । घर में जो भी हो देदो । 

छीके पर एक बथुए की पीन्डी रखी थी । पार्वतीजी ने पीन्डी खाकर , एक लोटा जल पीकर रवाने हो गयी । चलते - चलते शिवजी व पारवता जी एक बाग में ठहरे । शिवजी ने पूछा पार्वतीजी आपने क्या खाया ? 

पार्वता जी ने कहा - आपने खाया वहीं भोजन मैंने खाया । थोड़ी दूर आगे जाने पर शिवजीने फिर पूछा पार्वताजी आपने क्या खाया ? पार्वताजी ने जवाब दिया कि आपने खाया वही खाया । बेटी - जंवाई में कोई भेदभाव थोडे ही होवे । 

वह एक पेड़ के नीचे विश्राम करने लगे । पार्वताजी को नींद आ गयी । तब शिवजीने पावताजी के पेट की ढकनी खोलकर देखते हैं कि उसमें एक बछुए की पीडी और जल था । उन्होंने ढकनी वापिस ढक दी । 

पार्वताजी जब थोड़ी देर बाद ऊठी , जब शिवजी ने पार्वताजी से कहा कि आपने कहा कि मैंने खाया वहीं आपने खाया । पर आपके पेट में तो बथुए की पीन्डी और जल है । मैंने आपकी पेट की ढ़कनी खोलकर देखी है तो पार्वताजी ने कहा कि ससुराल की बात पीहर में और पीहर की बात ससुराल में ढ़कनी पड़ती है । पार्वताजी ने कहा अब आप ढ़कनी उल्टी ढक दे । जिससे कोई भी किसी के पेट की ढकनी खोलकर नहीं देख सके ।

दूसरी कहानी

गणगौर की तीज आई , पार्वताजी ने शिवजी को कहा - आज सब पूजन वाली आयेगी और उनको संवाग बांटना है । सब दूसरी जात की औरतें दौड़ - दौड़ने गई । पार्वताजी ने उनको घोबा - धोबा खूब संवाग बांटा और बाणीया , ब्राह्मण ऊँची जाति की औरतें स्नान करके वस्त्र - आभूषण धारण करके , सज - संवरकर पूजा करने पहुंची । 

शिवजी ने पार्वताजी से कहा कि आपकी खास सखी - सहेलियां तो अब आई है । आपने तो सब संवाग बांट दियो पर आपको तो संवाग देना पड़ेगा । तब पार्वताजी ने अंगुली में से मेंहदी निकाली , आंखों में से काजल , सिर से मेण निकाला , तिलक से रोली निकाली और हथेली में लेकर पानी से घोलकर सब औरतों पर छीटा दिया । जिसके पूरा छींटा मिला , उसको पूरा संवाग मिला , जिसके कम लगा उसको कम संवाग मिला ।

तीसरी कहानी

चैत्र का महिना आया । होली के दूसरे दिन से जंवारा बोकर लड़कियां गोर पूजने लगी । जब पार्वतीजी को भाभी के उजमणे के लिये पीहर जाना था तो महादेवजी ने पार्वतीजी से कहा मैं भी आपके साथ चलूंगा । तब ईसर - गौर नांदिया को साथ लेकर निकले । 

नंदी के ऊपर महादेवजी बैठे और पार्वतीजी पैदल चल रही थी तो लोग कहने लगे कि देखो - मोट्यार तो नंदी के ऊपर बैठा है और औरत पैदल चल रही है । इसके बाद पार्वतीजी नंदी पर बैठ गए और महादेवजी पैदल चल रहे थे तो लोग कहने लगे कि देखो , " औरत तो नंदीके ऊपर बैठी है और मोट्यार पैदल चल रहा है । 

जब ईसर - पार्वती दोनों पैदल चलने लगे । साथ - साथ नान्दियो भी चलने लगा । जब लोग कहने लगे कि देखो साध में वाहन होने के बावजूद भी पैदल चल रहे है । जब दोनों ही नदी के ऊपर बैठ गये । तो भी लोग कहने लगे कि - ' छोटो सो जीव है और दोनों ही नंदी के ऊपर बैठ गये । 

जब ईसरजी कहने लगे कि - देखो पार्वती दुनिया घोड़े पर बैठने देवं नहीं और न पैदल चलने देती है । शिवजी पार्वतीजी से बोला - ये मृत्यु लोक है । संसार है चड़े हुए को भी हँसे और पैदल में भी हँसे । थोड़ा आगे गया तो एक गाय कष्ट में थी । 

पार्वताजी ने पूछ - ये गाय क्यूं तड़फ रही है । शिवजी बोले - इसके बछड़ा होने वाला है । गोराद कहने लगी - बच्चे के लिये इतना कष्ट मैं सहन नहीं कर सकूगी , मेरे तो गांठ दे देयो । मेरे को बच्चा नहीं चाहिये । शिवजी , पार्वताजी दोनों और आगे गए तो एक घोड़ी उठ बैठ कर रही थी।

गोरादे कहने लगी कि घोड़ी कष्टी क्यों है ? जवाई सरजी कहने लगे कि इसके बच्चा होनेवाला है । गौरादे ने कहा मेरे गांठ दे देवो । मुझे तो इतना सहन नहीं होगा । ईसरजी आगे चले । आगे गए तो राजा की नगरी में उदासी छायी हुई थी । 

गोरादे प्रश्न पूछने लगी कि यहां सभी उदास क्यों है ? ईसरजी बोले - यहां रानी को कंवर होने वाला है । यह सुनकर गौरादे बोलती है कि बच्चे के लिये इतना कष्ट होता है तो मेरे को बच्चा नहीं चाहिये । मेरे गांठ देवो तो मैं चलू । गोरादे का हट आगे ईसरजी का चला नहीं तो गांठ देनी ही पड़ी । 

आगे ईसरजी ससुराल के गांव में पहुंचे । ईसरजी पीपल के पेड़ के नीचे वास किया । गोरादे पीहर में और सहेलिया में मग्न हो गयी । बड़ी गोर नजदीक आयी । जब गोरादे सहेल्या को लेकर चुइलो टिको लेने के लिये बाजार में गयी । 

वहां पर ईसरजी मोची का वेश लेने सुन्दर जूतियां लेकर बैठ गये । गोरादे का मन मोचड्या के पास चला गया । वह उस मोची को कहने लगी कि इस जूतीयां का दाम क्या है ? जब उस मोची ने कहा - देख बाई मैं तो बूढा हूँ । मेरे को तो एक घड़ा भरकर लाकर देदें । गोरादे घड़ा लेकर आ जाती है और कहती है कि जूतियां दे देवो । 

मोची बोलता है कि मेरे दो रोटी बनादो । गोरादे रोटीयां बना देती है और बोली - मुझे जूतियां का दामतो बताओ । मोची बोला - देख बाई मेरे कोई नहीं है , इतना समझले कि मेरे साथ दो कवा ले ले । यही जूतियां का मोल है । गोरादे इधर - उधर देखकर जल्दी से दो कवा ले लिया और जूतियां लेने घर पर आ गयी । 

जतियां महल में टांक दी सिंजारा के दिन ईशरजी पावणा आया । भोजन करके महल में सोने के लिये गये तो ईशरजी गोरादे से पूछने लगे । आज महल में रोशनी बहुत हैं । गोरा , बोलती है - " चांदणो पूतरो के , चांदों चाँदरो के चांदणों पियारो ! मेरे तो पुत्र भी नहीं है और पूर्णिमा भी नहीं जिसका चांद भी नहीं है । 

यहां दीपक की चांदनी है ईसरजी ने बोला ये तो रोशनी कोई दूसरी है , गोरादे क्या किया आप ही बताओ । ईसरजी ने कहा - " मोची के साथ दो कवा लिया उसकी रोशनी है । जब गोरादे जमीन कुचरने लग गये । ईसरजी ने बोला सच है या नहीं । गोरादे कहने लगी कि आपने कब देखा ? ईशरजी ने कहा - गोरादे यह तो मैं खुद था । दूसरा कोई और होता तो आप उनके साथ भोजन करते क्या । इस कारण औरतें मुझे ज्यादा ललचावनो नहीं । 

ईसरजी गोरादे घर आए । ईसरजी भोजन करने के लिये बैठे । जितना खाना बनाया वह सभी खा लिया । पांव से टक्कर मारकर झारी गिरादी , सासुजी कोशर्म आती है तो उतने में ही हांडी के ढ़कन खोलकर देखती है । बाद में गोरादे भोजन करने के लिये बैठती है । हांडी में कुछ नहीं होता है । 

जब मां गोरादे ने आठ बरसोला , दो सांगरी पिंड्या और लोटो भर पानी पीला कर सीख देती है । वहां से निकलने के बाद ईसर गोरादे पीपल के नीचे आए । ईसरजी ने बोला - यहां पर हम विश्राम कर लेते हैं गौरादे भूखी होने के कारण जल्दी से नींद आ गयी । नींद आई हुई को देखकर ईसरजी पार्वती के पेट की ड़कनी खोलने देखेतो आठ बर सोला दो सागरी पिंड्या और लोटा भर पानी में हिलडुल रही है और वापिस ढक्कन लगा देते है । 

गोरादे जागकर उठती है तब ईसरजी बोलते है - गोरादे आपने क्या खाना खाया ? गोरादे ने बोला - ईसरजी जो आपने खाया वहीं मैंने खाया । इसरजी कहते हैं कि सच बोलो । गोरादे कहती है कि एक हांडी में कोई भेदभाव होता है क्या ? ईशरजी ने गोरादे से कहा आपके पेट में आठ बरसोला , दो सांगरी पिंड्या लोटो भर पानी में हिलहुल रहा है । 

गोरादे ने कहा - जैसे मेरे पेट की डकनी खोलकर देखी वैसे सारे जग की खोलकर मत देखना । देखो पीहर की बात ससुराल में नहीं कहनी चाहिये और ससुराल की बात पीहर में नहीं कहनी चाहिये इतना कहकर आगे निकले । राजा के गांव में आए तो वहां बोल नगारा बज रहे थे और बधाईयाां बट रही थी । आनन्द ही आनन्द था । 

गोरादे पूछने लगी कि आज किस बात का आनन्द है? ईसरजीनेबोला - हम यहा से गये थे जब रानी कष्ट में थी । अब उनके घर लड़का हुआ है। इस लिये यहा पर आनन्द मना रहे है। जब गारादे बोलती है अब मेरी गाांठ खोलदो । ईसरजी ने बोला - मेरे दी हुई गाांठ खुलेगी नही। थोड़ा आगे गये कि घोड़ी के बच्चो होने से वहा भी खुशिया मनाई जा रही थी । जब पारवतीजी ने कहा - मेरी भी गाांठ खोल देवो । 

ईसरजी ने कहा - मैरी दी हुई गाांठ खुलेगी नही। आगे गया तो गाय का बछड़ा को चोट आई हुई थी । जब पार्वतीजी ने कहा - जानवर के बच्चे को भी इतना प्यार कर रहे हैं तो मानव के बच्चे की तो बात ही क्या ? 

देखो ईसरजी मेरी गाांठ खोल दो तो मैं आगे चलुगी नही तो मैं यहा पर ही रहूगी । जब ईसरजी डुम दुपया हुए तो पसीना आने लगा । शिवजी पारवतीजी तालाब के तीर पर गया । शिवजी माठी का एक पुतलो बनाकर अपने गण ( दतू ) से कहा कि जिसकी माां अपने बच्चे पीठ फेरके सो रही हो वे उन बच्चा का सिर काट ले आना । 

गण सब जगह घूमे, लेकिन कोई नही मिली । एक हथनी आपके बच्चा ने पीठ फेर कर सो रही थी । गण हाथी बच्चो को सिर काट के ले आया , शिवजी उस पुतला पर हाथी के बच्चों को सिर लगायो , पारवतीजी से बोला - ये लो बच्चा । 

पारवताजी ने बोला ! ऐसा सुण्ड वाला धुन्ध धुन्धालो बेटो तो मेरे को नही चाहिए । दुनिया देखेगी तो हसेगी । शिवजी ने कहा - आज से इसका नाम गजानन्द है। सब दुनिया सांसार में कोई सुभ काम होगा जब सबसे पहली आपके बेटा गजानन्द की पूजा करेंगे, बाद में दुसरो काम करेंगे।
जिससे पूरी दुनिया में आनन्द व खुशियाली होगी । पर्वताजी ख़ुशी से वापस कैलास पर्वत पर विराज गये। 

चौथी कहानी

राजा ने बोए जौ - चना , माली ने बोए दुब , राजा का जौ - चना बढ़ता जाए व माली की दुब घटती जाए । एक दिन माली के बेटे ने सोचा की राजा का जो - चना कैसे बढ़ रहे हैं, लेकिन मेरी दुब कैसे घट रही है? लम्बी - लम्बी दुब में जाकर छुप गये। लड़किया आकर किसी का हार खींचे कोई का डोरा खींचे । क्यों मेरा हार खींचो, क्यू मेरे डोरा खींचो । 

सोलह दिन का पूजापा देकर जायेंगे। सोलह दीन पूरा होते ही लड़किया आई । मा- मा पूजापा लाई, इसको कहा रखू। मा ने कहा - ओबरी में रख दो , लड़कियाां ओबरी में पुजापा रखकर वहा से चली गई । माली का बेटा आया कहा कि मााँ- मााँ लड़किया आयी थी । पुजापा ओबरी में रखा हुआ है । बेटे को कहा - जाकर पूजापा ले ले । 

बेटे ने ओबरी के एक लात मारी , दो लात मारी । मा- मा ओबरी तो नही खुले । ओबरी नही खुले तो परायी लाई हई को कैसे निभायेगा । परायी लायी हई को तो निभा लूंगा, लेकिन ओबरी नही खुले । नाखून में से मेंहदी निकाली । आख में से काजल , सिर में से रोली , चिटकी अगुली से छीटे दीये । फट से ओबरी खुल गई । देखें तो पूजापा की जगह हीरा , माणिक , मोती चमक रहे थे । तीज माता उनसे प्रसन्न हुई जैसी सबसे हो।

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