शीतला माता की कहानी - चैत्र माह

शीतला माता की कहानी 
शीतला माता की कहानी - चैत्र माह

शीतला माता की कहानी

कहानी - शील और ओरी दोनों बहनें थी । होली का अंतिम दिन आते ही दोनों बहनें बोली - हम शहर चलकर देखें कि लोग हमारा कितना मान - सम्मान करते हैं । अपनी मान्यता को देखने के लिये दोनों बहनें शहर में आकर सबसे पहले वे दरबार में गई तो वहां पर नौकर - चाकर काम कर रहे थे । दोनों बहनों ने उनको जाकर बोला कि हमें भी कुछ न कुछ देवो । 

तब नौकर - चाकर ने कहा - हमारे पास तो केवल घोड़ा के लिये दाना उबल रहा है । उन्होंने गर्म - गर्म दाना दोनों बहनों को देने पर वह जल गई । जिससे उनके हाथ में फफोला ( छाले ) हो गये । 

इस कारण दोनों बहनों ने श्राप दे दिया कि सातवें दिन ही आपकी नगरी में आग लग जायेगी । ऐसा कहकर दोनों बहना वहां से चली गयी । इसके पश्चात् एक सेठ के घर आकर बोली - मुझे कुछ ठण्डी - ठण्डी खाने के लिये देवो । 

तभी उनकी छोटी बहू बोली मेरे सासुजी तो बाहर गये हुए हैं । फिर भी वह डरती - डरती मुश्किल से एक - एक कटोरी करबो लेकर आई तो दोनों बहनें बोलने लगी कि थोड़ा - सा और करबा लाओ व जितना भी है वह सभी डाल देवो और उस पर सीधा ढकन ढक दो । 

उस समय माताजी बोले कि तुम्हारे नगर में सातवें दिन आग लग जायेगी , किन्तु तुम्हारा घर बच जायेगा । तब छोटी बहू बोली ! मेरे घर की साथ - साथ मेरे पड़ौसी का भी घर रखो । क्योंकि मेरी साख कौन भरेगा ? 

तब माताजी ने एक कोरो करवा देकर कहा कि तेरे और पड़ोसी के घर के आगे कार ( रेखा ) खींच दी है । फिर दोनों बहना बोली कि मेरे माथे से जूऍ निकालो , पर तुम डरना मत । हम शील और ओरी दोनों बहनें हैं । हम दोनों के आगे - पीछे दोनों जगह आंखें हैं । 

छोटी बहू बोली मेरी नगरी में आग तो लगेगी । लेकिन कोई आकर पूगे तो मैं उन्हें क्या बताऊं ? आप जहाँ विराजते हैं वहां का स्थान मुझे बता दो । तब दोनों बहना बोली खोखले पीपल में बैठी है , ऐसा कहकर वह चली जाती है । 

जैसे ही साता दिन आग लगती है तो सारी नगरी जल जाती है । तब राजा बोलता है कि हमारी नगरी कैसे जल गयी । देखकर आओ कि कोई घर बचा है क्या ? तब एक ने कहा कि हां एक घर बचा है । तब राजा उसके पास गया और कहा कि ए बाई तुम क्या कामण - डुमण जानती हो , जिससे तुम्हारा घर बच गया । 

तब छोटी बहू बोली ! शील और ओरी दो बहनें आई थी । तब उनको घोड़ी का गर्म - गर्म दाना डालने से वह जल गयी । उनके हाथ में छाला ( फोड़े - फुसी ) हो गये । जिससे वे गुस्सा में आकर श्राप दे दिया कि तुम्हारी नगरी में आग लग जायेगी । 

फिर मेरे घर आयी , तब मैंने में ठण्डा - ठण्डा जल देकर ठण्डाकिया और पड़ौसी का भी घर रखा । अब वे दोनों बहना खोखले पीपल में बैठी है । राजा वहां गया और उनसे माफी मांगी और पांव पकड़ कर कहा - माताजी हमसे गलती होगयी , आप हले क्षमा कर दो । 

तब माताजी ने कहा कि आप माताजी के नाम का स्थान बनाकर मेरी वहां पर स्थापना करो और नगरी में कहलाओ कि होली के बाद माताजी का दिन आवे तब ठण्डा खाओ । हो सके तो आठ बार खाओ , चारबारखाओ , दोबारखाओ , लेकिन बच्चों की मां कोतो एक बार जरुर - जरूर ठण्डा भोजन करना है । माताजी सभी पर प्रसन हो गये । 

जो भी व्यक्ति माताजी की इस कहानी को कहते समय , सुनते समय बीच - बीच में हुंकारा देते हैं उन सभी को माता जी ठण्डा झोला देते हैं ।

बोलो शीतला माता की जय | 

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