कहानी भगवान हर कण कण में है | परम भक्त

कहानी भगवान हर कण कण में है bhagwan ki kahani

कहानी भगवान हर कण कण में है 

वेंकटाचल में वसु नाम के एक  निषाद रहते। वे भगवान के  परम भक्त थे। स्वामी पुषकरिणी तीर्थ में भगवान विष्णु को चावल व शहद का भोग लगाना , उसके बाद ही भोजन - प्रसाद पाना उनका नित्य - नियम था । 

एक  दिन उनकी पतनी चित्रवती ने पुछा : " स्वामी ! आप रोज चावल व शहद कहा ले जाते हैं?  वसु ने कहा  संसार का पालन और भक्तों की मनोकामना पूरी  करने वाले भगवान विष्णु को भोग लगाने जाता हु | 

यह बात सुन उनके बेटे वीर ने पुछा : " पिताजी ! वहा बैठे- बैठे भगवान सबका पालन पोषण और मनोकामना कैसे पूरी करते हैं? बेटा ! भगवान केवल मूर्ति  में ही नहीं हैं, वे तो सर्व व्यापी हैं, सर्वज्ञ हैं और सर्व समर्थ है। उन पर अविश्वास कभी नहीं करना चाहिए। 

यह बात बालक वीर के मन में गहरी उतर गयी एक दिन वीर के माता - पिता पुत्र को खेत की देखभाल सोप कर शहद लेने जंगल चले गये । बहुत समय बीतने के बाद भी वे वापस नहीं लौटे । वीर भूख से व्याकुल होने लगा । तभी उसे विचार आया कि ' भगवान भी भूखे होंगे । 

अब तो उससे रहा नहीं गया । उसने तुरंत जैसे - तैसे चावल पकाये और बिना शहद के ही भोग लगाने चल पडा । थोडा आगे पहुूँचते ही उसे याद आया कि ' अगर जानवर खेत खा गये तो खूब मार पडेगी । ' फिर सोचा कि ' मेरी तरह भगवान भी भूखे होंगे । अब क्या करू ? ' अचानक उसे अपने पिताजी की बात याद आयी और उसके चेहरे पर चमक आ गयी कि ' भगवान तो सर्वथ व्यापी है तो वे यहा भी होंगे। 

निदोष हृदय से उस बालक ने बडे प्रेम से एक वक्षृ के मूल में भगवान को अर्पण करने के भाव से भोग रखा और घर आकर स्वयं भी भोजन - प्रसाद लिया । जब वसु वापस आये तो चावल देख क्रोधित हो उठे : " वीर ! तुमने भोग लगाये बीना ही भोजन कर लिया ? 

नहीं पिताजी ! मैंने भोग लगाकर ही खाया है । " " खेत छोड़कर तू  पुषकरिणी क्यों गया अरे पिताजी मै  पुषकरिणी नहीं गया था । तो तू  झ ठ क्यों बोल रहा है? " वीर पिताजी का हाथ पकड़कर ले गया और वक्षृ को  लगाया हुआ भोग दीखाया । 

वसु बोले : " दुसट ! तू मेरा मजाक उडा रहा है ! भगवान का अपमान करता है ! तेरी इतनी हिमत कि पेड की  जड में चावल डाल के कहता है कि भगवान को भोग लगाया है ! " वसु ने तिलमिलाकर वीर को मारने के लिए  तलवार उठायी , तभी पीछे से किसीने उसका हाथ पकड़ लिया । मुड़कर देखा तो पेड की जड से आधे बाहर आये हुए भगवान चतुभुजी नारायण भक्त की ओर देखकर मंद - मंद मुस्कुरा रहे हैं। 

अपने इष्टदेव को साक्षात प्रकट देख वसु तलवार छोडकर उनके चरणों में जा गिर पडे । बोले : " भगवन्! मुझे क्षमा कर दीजिये। मेरे उदंड पुत्र ने आपका बहुत अपमान किया है । " भगवान बोले : " तुम गलत समझ रहे हो वसु! तुम्हारा यह पुत्र मुझे तुमसे भी ज्यादा प्यारा । तुम मुझे सवथव्यापि कहते तो हो मगर मानते केवल पुषकरिणी की एक मूर्ति में हो । 

मगर वीर की निर्दोष आखो में तो मैं सवत्र हु । इसीलिए मैं प्रत्यक्ष दर्सन दे रहा हु। " - ऐसा कहकर भगवान अंतर ध्यान हो गये । वसु को अपनी भूल का एहसास हुआ । उन्होंने पुत्र को हृदय से लगा लिया ।

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