गुरु गोविन्द की प्रसीद कहानी - घमंड कभी न करे

गुरु गोविन्द की प्रसीद कहानी - घमंड कभी न करे


गुरु गोविन्द की प्रसीद कहानी - घमंड कभी न करे


एक बार की बात है गुरु गोविन्द सिंह कुरुक्षेत्र के मेले में पंडाल लगाकर सुबह - शाम सत्संग करते थे । हयात महापुरुष के दर्शन करने - और उनके सानिध्य का लाभ उठाने दर - दर से श्रद्धालु आते थे । सत्संगयों में चंद्र नाथ नाम का एक बहादुर व तीरंदाज राजपुत भी आता था । उसे अपनी तीरंदाजी पर बहुत घमंड था । 

एक दिन की बात है  बातचीत के दौरान उसने गर्व से कहा : " गुरुजी ! मेरे निशाने की बराबरी करनेवाला संसार में कोई तीरंदाज पैदा ही नहीं हुआ है । " गुरु गोविन्द सिंह ने सोचा , ' यह बेचारा अपने कला - शैली के अहंकार में , सबको कला - शैली की सत्ता देनेवाले उस अकाल पुरुष जिसे हम भगवान कहते है उसे भी भूल रहा है । 

नशवर वाहवाही पाने के चकर में यह चौरासी के चकर में फसने के रास्ते जा रहा है । अतः जीव और जगदीश्वर के बीच सबसे बडे अवरोध अहं से भक्त को बचाने के लिए गुरुजी मुस्कुरा के बोले : " हाँ चंद्र ! मैंने भी तुम्हारी बहादुरी व तीरंदाजी के चचे सुने हैं पर अब उसे प्रत्यक्ष देखने की उत्सुकता हो रही है । 

" गुरुजी के वचन सुनकर चंद्र नाथ अहंकार से और फूल गया । अपना कौसल दीखाते हुए उसने बडे गर्व से बाण चलाया । बाण दो मील दूर लक्ष्य पार कर शांत हुआ । आसपास के लोग चन्द्र नाथ की वाहवाही करने लगे । 

गुरुः गोविन्द सिह बोले : " वाह चंद्र ! तुम्हारी तीरंदाजी का जवाब नहीं ! लाओ धनुष , मैं भी कोसिस करता हु तुम्हारे जैसा तीर चलाने की ।  गुरुजी ने निशाना लगाया और बाण गंतव्य की ओर चलता हुआ तीन मील दूर लक्ष्य को भी पार कर गया । 

गुरुजी की तीरंदाजी देख कर चंद्र नाथ का सारा अभिमान चूर हो गया । वह गुरु गोविन्द सिंह के चरणों में पडा : " गुरुजी ! क्षमा कीजिये , वाहवाही सुनते - सुनते मेरी मन को अहंकार  के आवरण ने ढक दिया था । आपने मेरी आूँखें खोल दीं , अब आप ही मुझे सच्ची राह दिखाइये ।  

गुरुजी बोले : " बहादुर ! तीरंदाज होना कोई बडी बात नहीं है । यह तो सारा अभ्यास का खेल है , इसमें अहंकार किस बात का ? रूप - सौंदर्य , सत्ता , कला - कोशल का अभिमान करते - करते तो कई मर गये । अब देखो तो उनके नामो - निशान भी नहीं । अतः तुम अपना कला - कोशल व बहादुरी उस अकाल पुरुष को जानने में लगाओ 

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