गुरु और राजा की कहानी हिंदी में - बाबा अमरनाथ

गुरु और राजा की कहानी हिंदी में


गुरु और राजा की कहानी


किसी समय में एक सिद्ध योगी बाबा अमरनाथ थे एक बार उन्होंने अपने शिशयो सहित सिरमौर जिले में नाहर शहर के बार डेरा डाला बाबाजी ने अपने एक शिशय को कहा बेटे शहर से जाकर भिक्षा लेके आओ और हा राजभण्डार से आम का अचार जरूर लेके आना | 

भिक्षा एकत्र करके शिशय राजभण्डार से अचार लेने गया | उन दिनों नाहर में आम नहीं होते थे राजा रहिस लोग बाहर से मंगवाते थे फिर भी राजा की आज्ञा से भंडारी ने उसे अचार दे दिया यह क्रम लगातार तीन दिन तक चला

लेकिन चौथे दिन अचार मांगने पर राजा ने गुस्से से कहा  क्या रोज रोज अचार मांगने आ जाता है तेरे गुरु का क्या नाम है ?

तब उसने कहा मेरे गुरु बाबा अमरनाथ है राजा जोर से हँसा और बोला गुरूजी तो अमरनाथ और चेला आम के अचार के लिए तरसते फिर रहे है अगर तुम्हारे गुरु को अचार की इतना ही शोख है तो तुम्हारे गुरु आम के पेड़ क्यों नहीं लगा लेते है | 

चेला खाली हाथ लोट कर गुरूजी को सारी घटना कह सुनाई और अमरनाथजी पर उस बात का कोई असर नहीं हुआ क्युकी वे मान-अपमान, सुख-दुःख से अपार थे वे हमेसा अपनी मोज में रहते थे | 

लेकिन संत के अनादर करने पर प्रकति हमेसा सजा देती है और राजा ने तीन दिन तक सेवा की थी तो उसका पतन संत कैसे होने देता और उन्होंने उसी शाम संध्या वंदन के बाद पास के मैदान में संकलप करके जल छिड़क दिया और जहा भी जल को बुँदे पड़ी वहा आम के पेड़ तैयार हो गए और उन पर फल भी लग गए | 

सुबह जब राजा घूमने निकला तो मैदान की जगह आम के पेड़ देख कर चिंता में पद गया और बाबा अमरनाथ जी का यह चमत्कार देख कर राजा को अपने किये अपराध पर पछताप होने लगा और उसका मन जलने लगा |

राजा दौड़ा दौड़ा गया और बाबा के पेरो में पड़ गया और अपने अपराध की छमा मांगी और बाबाजी ने राजा को माफ़ कर दिया | 

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